Thursday, October 2, 2008

gazal

एक ऐसा मोड़ के फिर दूर तक कुछ भी नहीं
एक ऐसी राह थी के हम खड़े थे हर तरफ़

और फिर पत्थर की इक दीवार थी जो गिर गई
देखते ही देखते अब रास्ते थे हर तरफ़

भूख तो अच्छी लगी थी पर जरा कुछ और दिन
ख्वाब अब भी वादियों में अधपके थे हर तरफ़

दुनिया बहुत ज्यादा बड़ी है घूमने के वास्ते
पर हमेशा रास्ते कच्चे मिले थे हर तरफ़

घर सजाने के लिए हम क्या हटाते फर्श से
सबसे ज्यादा ख्वाब ही बिखरे पड़े थे हर तरफ़।

Sunday, September 21, 2008

salaam

पहले भागने वाले झट से लापता हो गए किसी बस ट्रेन या ऑटो या पैदल जिस तरह से भी............
बहुत ज्यादा जलालत, लोग थे कुछ,सह नहीं पाए...वो कुछ बेहतर तमाशे देखने की जिद में हैं शायद
koiऐसा करिश्मा जो कभी सदियों में मुमकिन हो, या शायद वो भी नामुमकिन
जिन्हें शर्मोहया में बंद रखना था कुंवारापन, वो सब झेंप कर थोड़ा हुए रुखसत वहाँ पर से
वहाँ पर से जहाँ पर जंग जारी थी उनके पीछे.......
मैं उस बेशर्म बे गैरत की बातें करना चाहूँगा जिसे कूचा गया और थूर कर फोडा गया पहले ,
अभी दो चार मिनटों में तमाशा खुलने वाला है
हमारे लnd पे बैठा हुआ मोटा सा कनगोजर के समझो डेढ़ फुट लंबा, बहुत ही लिजलिजा चिकना
डर के वो लम्हें bahut kuchh honge aise hi
के जिन लम्हों में उनके हौसले टूटे या na टूटे, उनका पर्सनल मुद्दा है, छोड़ो ये कहानी तुम,
के आख़िर तक टिके rehna bhi ik achchhi kahani hai, bahut achchha fasaana hai
kabhi sunne aunaane ko,
magar wo hi kahe,
jo ant tak parde pe thehra ho.............................